29 जुलाई, 2024

बच्चों को चांदीपुरा वायरस से बचाएं।

 

बच्चों को चांदीपुरा वायरस से बचाएं।


1965 में सबसे पहला केस महाराष्ट्र के नागपुर जिले के चांदीपुरा गांव में सामने आया था। इसमें चांदी जैसा कुछ नहीं है, बल्कि यह रबडोवायरस परिवार का वायरस है, जो  खासकर 15 साल से कम उम्र के बच्चों का खतरनाक हत्यारा है।


आर्द्र जलवायु यानि मानसून में इसका प्रसार अधिक होता है। पश्चिमी भारत में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों में पाया जाता है।

एक बार संक्रमित होने पर इलाज शुरू न होने पर 48 से 72 घंटों के भीतर बच्चे की मृत्यु हो जाती है। ऐसे मामलों में 100 में से 75 से 80 प्रतिशत मामलों केस में मौत हो जाती है। इसकी ऊष्मायन अवधि कुछ घंटों से लेकर दिनों तक होती है।

यह वायरस फ़्लेबोटोमाइन नामक मादा सैंडफ्लाई मक्खी और एडीज़ मच्छर द्वारा फैलता है। डेंगू वायरस भी एडीज मच्छर से फैलता है। जब गंदगी होती है, जलभराव होता है तो लोग शौच के लिए खुले में जाते हैं, ये मच्छर और मक्खियाँ गंदगी में ज्यादा फैलते हैं। जिन घरों की दीवारें गाय के गोबर से लिपी होती हैं उन घरों में रेत मक्खियों का फैलना अधिक आम है। चांदीपुरा वायरस अगर हमें काटता है तो हम पर असर करता है।

एक बार संक्रमित होने पर, बच्चे को तेज बुखार, उल्टी, मांसपेशियों में दर्द, शरीर में दर्द, थकान, सांस लेने में तकलीफ, निमोनिया आदि का अनुभव होता है। जैसे ही वायरस रक्त के माध्यम से तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है, बच्चा चेतना खो देता है। उसे ऐंठन होने लगती है और वह बेहोश हो जाता है। यदि एक्यूट इंसेफेलाइटिस के सभी लक्षण दिखाई दें तो बच्चे की जान खतरे में है। मस्तिष्क की कोशिकाएं खिंचने से एठन होने लगती हैं।

इसके निदान के लिए बच्चे के रक्त सीरम से आरटी-पीसीआर से और एलिसा टेस्ट के जरिए भी निदान किया जा सकता है।

इस वायरस के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा नहीं मिली है।

 लेकिन बच्चे को उसकी परेशानी के मुताबिक तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जाता है और इलाज शुरू किया जाता है. बुखार की दवा उसके लक्षण के अनुसार शुरू की जाती है। दर्द की दवा, यदि रोगी को घरघराहट या निमोनिया हो जाता है, तो उसे पीआईसीयू में भर्ती किया जाता है और इलाज किया जाता है।


इलाज से ज्यादा रोकथाम पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए स्वस्थ माहौल और पर्यावरण बहुत जरूरी है। घर में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति, साफ-सफाई, नमी को दूर करना जरूरी है। रेत मक्खियों और मच्छरों को फैलने से रोकने के लिए कीटनाशकों का छिड़काव करना, हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोना आदि कीटाणुओं को फैलने से रोकते हैं। मानसून से पहले घर की दीवारों की दरारों की मरम्मत करें, फर्श के लिए गाय के गोबर का उपयोग न करें। इसमें सैंडफ्लाई के लार्वा विकसित हो जाते हैं।

 बच्चों को मच्छरदानी में रखें। नंगे पैर बाहर खेलने से बचें। खुले में शौच करना बंद करें और शौचालय का ही प्रयोग करें। इसके वैक्टर के प्रसार को रोकना चांदीपुरा वायरस को रोकने के समान है, क्योंकि अभी तक कोई टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन भविष्य में इस पर शोध संभव हो सकता है।




यदि बच्चे में उपरोक्त में से कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाएं और उनकी सलाह के अनुसार बच्चे को भर्ती कर लें।








Disclaimer:
This blog is for informational purposes only and is not a substitute for professional medical advice. Always consult a healthcare professional regarding your child’s health. In case of an emergency, seek immediate medical attention.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Thank you for visiting our Blog